
Maqam: RastGenre: nasheed, naatYear: 2010Type: nasheedComposer: Ali Zafar (modern adaptation of traditional composition)
Story & Cultural Context
Balaghal Ula Bi Kamaalihi is a famous Naat Sharif praising the Prophet Muhammad, originally from Persian poetry and popularized in Urdu. Ali Zafar's rendition brings a contemporary musical style to this timeless piece, making it accessible to modern audiences while maintaining its spiritual essence.
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Credits
ComposerAli Zafar (modern adaptation of traditional composition)
LyricistAmir Khusro (traditional lyrics)
ArrangementAli Zafar
ProducerUnknown
LabelWithout label
Story & Cultural Context
Balaghal Ula Bi Kamaalihi is a famous Naat Sharif praising the Prophet Muhammad, originally from Persian poetry and popularized in Urdu. Ali Zafar's rendition brings a contemporary musical style to…
Titles in Other Languages
العربيةبلغ العلا بكماليه
EnglishHe Reached the Heights with His Perfection
Lyrics
ختم رسول کعبے مقصود توئی در صورت ہرچہ ہست موجود توئی آتکمال آینست بتو آزاد کے در پردہ نہبود توئی सुहानी रात थी और पुर सुकू जमाना था असर में डूब हुआ जजब आशिकाना था उन्हें तो अरश पे महभूब को बुलाना था हवस थी दीद की मेराज का बहाना था सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी एक माल हुस्न का मौजदा ये फिराग हक भी न सह सका सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी शबे मेराज लिया अरश परी पर बुलवाए सदमाइ हिजर खुदा से भी कवारान हुआ ना हुआ सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी सरला मकास तलब हुई सूव मुन्तहा वो चले नभी कोई हद है उनके उरूज की कोई हद है उनके उरूज की बला गल गुला भी कमाल ही कोई हद है उनके उरूज की बला गल गुला भी कमाल ही सरला मकास तलब हुई कोई हद है उनके उरूज की सरला मकास तलब हुई कोई हद है उनके उरूज की खैरुल वरा सदरुत्तु का गजमुल खुदा नूरुल वला शम्सु तुहाब दरुत्तु जा यानी मुहमबद मुस्टफा कोई हद है उनके उरूज की जो गया है फर्ष से अरश तक वो बुराक ले गया बेधडख तबके जमीबर के फलख ते नीच पाँसे कुल सरख लट जुल्फ की जो गई लटक तजहान सारा गया महक कोई मस्त बुलबुल इश्क कदल कोई घुनच बोल चटक चटक कोई हद है उनके उरूज की कोई हद है उनके उरूज की कोई हद है उनके उरूज की कोई हद है उनके उरूज की रुह मुस्तफा की ये रोषनी ये तजल्यों की हमाहमी ये हरेक चीज चमक उठी कशफतु जाब जमाल ही कोई हद है उनके उरूज की बलगल उला भी कमाल ही कोई हद है उनके उरूज की बलगल उला भी कमाल ही ना फलक ना चांद तारे ना सहर ना रात होती ना तराज माल होता ना ये काइनात होती कोई हद है उनके उरूज की बलगल उला भी कमाल ही कोई हद है उनके उरूज की बलगल उला भी कमाल ही ए मजर नूरे खुदा बलगल उला भी कमाल ही मौला अली मुश्किल कुषा कशफत तुझा भी जमाल ही हसनैन जार फात्मा हसनत जल्यों के साले ही यानि मुहमद मुस्तफा सलू अलेहमाले ही रुह مصطفा की ये रोशनी बलगल उला भी कमाल ही ए मजर नूरे खुदा बलगल उला भी कमाल ही मौला अली मुश्किल कुषा कशफत तुझा भी जमाल ही हसनैन जार फात्मा हसनत जल्यों के साले ही यानि मुहमद मुस्तफा सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही सलू अलेहमाले ही